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  आइये बहनों अपने प्रतीक चिन्ह को समझें:दीपिका डा. प्रवीण गुप्ता बहिनों आज हम बात करते हैं अपने समाज के प्रतीक चिन्ह के विषय पर--- यह प्रतीक चिन्ह जो हमारे समाज की पहचान के रूप में हमारी धरोहर है सूर्य का प्रतीक एक गोल घेरा जिसकी परिधि पर किरणें व प्रकाश के प्रतीक रूप में क्रमशः 24 रेखाएं तथा 24 त्रिभुज है। जो दिन रात 24 घंटे के प्रतीक हैं, घेरे के अंदर एक स्वास्तिक चिन्ह जिसकी भुजाएं दाहिनी ओर घूमती हुई किनारों पर कुछ गोलाई लेकर मुडती हुई है। स्वास्तिक के चार कोणों में 4 बिंदु है स्वास्तिक के नीचे की ओर माथुर वैश्य शब्द है वे मानो स्वास्तिक को अपने कंधों पर धारण किए हों । माथुर वैश्य शब्द हमें स्वास्तिक के अंदर ही लिखना होता है जैसा की चित्र में दर्शाया गया है। प्रतीक चिन्ह को किसी भी एक रंग में छपवाया जा सकता है, यदि बहुरंगी छपवाना हो तो उस दशा में स्वास्तिक तथा बिंदु लाल रंग में होंगे व गोले की परिधि -- परिधि पर किरण सूचक रेखाएं तथा माथुर वैश्य शब्द नीले रंग में रहेंगे ,त्रिभुज पीले रंग में होंगे। अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा के प्रतीक चिन्ह के रंग रूप ,डिजाइन में कोई भी व्यक्ति परिवर्तन नहीं कर सकेगा। सभी इकाइयों द्वारा मुद्रित सामग्री पर प्रतीक चिन्ह होगा बगैर प्रतीक चिन्ह मुद्रित सामग्री का वितरण निषेध होगा, ऐसा हमारे विधान में लिखा हुआ है। और विधान किसी भी समाज की आत्मा होती है। बहनों मेरा तो अपना मानना तो यह भी है, कि हम अपने विवाह के कार्ड पर, अपने विजिटिंग कार्ड पर और अन्य सामग्री पर भी मुद्रित कर सकते हैं जिससे हमारे समाज की पहचान बन सके। लेखिका केन्द्रीय महिला मंडल की महामंत्राणी हैं।
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जो अपने सगों को न छोड़े , उससे उम्मीद भी क्या करोगे प्यारे 

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सुरभी 

दल बदलू
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दल बदलू या वेपैंदी का लोटा कुछ भी कहिए सच तो यह है कि वह इंसान ही क्या जो समय पर परिस्थितियों के अनुसार बदले ही ना!
वैसे भी जब अपने ही दल में धोबी के कुत्ते की तरह हो जाए जो घर का ना घाट का तो दल बदल कर लेना ही फायदेमंद साबित हो जाता है।
भई जब हमें धोबी का कुत्ता ही बनना है तो क्यों न दूसरे दल में जाया जाए जहां कम से कम हमें हमारा सही दाम भी मिले एवं हमारा बरसों का सपना जैसे कोई महत्त्वपूर्ण पद, मंत्री बनने या मनचाहे क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिलने का पूरा हो सके।
साथ ही समर्थन देने का उतना समर्थन मूल्य भी मिल सके जिसके हम हकदार है!
कई दलबदलू तो शायद पैदा ही इसीलिए होते है वे हर चुनाव में नए रंग की टोपी लगाए मिलते है
उनकी महत्वाकांक्षा असीम, अपार एवं अनन्य होती है अक्सर देखा जाता है कि वह किसी दल से टिकट लेते हैं लेकिन जीत हासिल नहीं कर पाते किंतु चुनाव में बाजी लगाने से बाज नहीं आते दरअसल यह वह लोग होते हैं जो चुनाव युद्ध के सारे दांवपेच जानते हैं उन्हें पता होता है कि जितना हमारा चुनाव मैदान में ताल ठोकने पर खर्च होता है उतना तो संभावित जीतने वाले प्रत्याशी को एन वक्त पर समर्थन देकर बैठने पर हमें समर्थन मूल्य मिल ही जाएगा ,हमारा क्या जाएगा?
आम केआम गुठलियों के दाम....
एक तो क्षेत्र में नेताजी का टैग मिलेगा दूजे पांच साल तक का हिसाब किताब भी बनेगा साथ ही जनता को भ्रमित कर उनके काम कराने का झांसा देकर पैसे ऐठने का मौका भी मिलेगा!
कुल मिलाकर पांचों उंगली घी में और सर कढ़ाई में तो फिर दल बदलने का नुकसान भी क्या ?
खैर लोकतंत्र में जब हमारे संविधान ने दल बदलू होने का अधिकार दिया है तो हमें एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते संविधान का अनादर भी नहीं करना चाहिए
एक दलबदलू नेता को चाहिए कि जब वह अपनी पार्टी में होकर किसी अन्य विपक्षी पार्टी के खिलाफ यदि भाषण दे तो उसे इस प्रकार की भाषा शैली अपनानी चाहिए जिससे कि आगे आने वाले दिनों में जब वह विपक्षी पार्टी में बिक जाए तो अपने पुराने भाषणों पर शर्मिंदा ना होना पड़े!
और फिर मीडिया भी उनको बार-बार ना दिखा सके कि नेता जी देखिए पहले तो ऐसे कह रहे थे और अब ऐसे कह रहे हैं
एक बार एक दल बदलू बड़े नेता जी अपनी ही पार्टी में रहते हुए मंच से किसानों के हित में भाषण देते हुए कह रहे कि हमारे देश के किसान आत्महत्या कर रहे हैं गरीबी एवं कर्ज के बोझ तले दब गए हैं मैं उनको अधिकार दिलाने के लिए विपक्ष के खिलाफ उनके साथ सड़कों पर धरना दूंगा लेकिन वे भूल गए कि अगले चुनाव तक उन्हें उसी विपक्षी पार्टी में जाना है !
मीडिया का क्या पीछे पड़ गई और हमेशा फांस की तरह गले में अड़ गई तब नेता जी ने कहा कि मैं यह कहना भूल गया था कि जब मैं विपक्षी पार्टी में जाऊंगा तब किसानों की सारी समस्याओं को निपटाऊंगा और उस समय जिसने मेरा भाषण तैयार किया उसे भी बताना भूल गया था कि भाषण ऐसा लिखना कि दलबदलने पर घोर प्रतिक्रिया न सहनी पड़े!
लेकिनआज देश की तमाम समस्याओं को निबटाने की खातिर मैं दलबदलू हो गया हूं
इसमें मेरा कोई निजी लाभ नहीं है!
अब आप समझ ही गए होंगे कि कोई नेता दलबदलू अपने स्वार्थ के लिए नहीं बनता बल्कि जनता और देश की भलाई की खातिर उन्हें ऐसा करना पड़ता है!

दलबदलू होने का अंदाज नया है
गीत पुराना लेकिन साज नया है
तुम नाचते रहो बेसुरी तालों पर
मैं तो वहीं पुराना हूं पर सरताज नया है!!!

व्यंग लेखिका
कवियत्री संध्या सुरभि

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श्रीगोपाल गुप्‍ता

                                                       विधानसभा उप निर्वाचन 2020 स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं शान्तिपूर्ण संपन्न कराने के लिये कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी श्री अनुराग वर्मा एवं पुलिस अधीक्षक श्री अनुराग सुजानिया की उपस्थिति में 30 सितम्बर को दोपहर 12 बजे न्यू कलेक्ट्रेट में बैठक आयोजित की गई है।